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*** सुख की उपभोक्तावादी परिभाषाओं के विरूद्ध : ईदगाह

ईदगाह पढ़ कर प्रायः पहला विस्मय हामिद के बारे में होता है। ऐसा बच्चा सचमुच का हो सकता है क्या। उम्र चार पांच साल। गरीब सूरत गरीब हालत। दादी का इकलौता अनाथ। अड़ोसियों पड़ोसियों की अभिभावकता में साथी बच्चों के साथ गांव से शहर तक पैदल चल कर जाता है , सारे दिन भूखा प्यासा मेले में भटकता है और भूखा ही लौट आता है क्योंकि दादी के हाथों को जलने से बचाने के लिये एक चिमटा खरीदना ज्यादा ज़रूरी था। बहुत दिनों तक इस कहानी के विषय में चर्चा हामिद के चरित्र की स्वाभाविकता और बाल मनोविज्ञान की समझ के आस पास घूमती रही। स्वयं प्रेमचंद ने अपनी ओर से ऐसे अनेक विवरण जुटाये हैं जो स्वाभाविकता की कसौटी पर हामिद के चरित्र के औचित्य को प्रमाणित करते हैं। हम कह सकते हैं कि कहानी के भीतर इस स्वाभाविकता का अर्जन किया गया है। पाठक इस संदर्भ में अपनी इच्छा और अनुभव के दायरे के अनुसार पक्ष और विपक्ष दोनो ओर से तर्क जुटा सकता है। यथार्थ और स्वाभाविकता की हमारी कसौटी प्रायः इसी के द्वारा निर्धारित होती है कि हमारा अपना अनुभव और दूसरों के अनुभव के बारे में हमारी जानकारी की सीमा क्या है। किसी कृति पर इस संदर्भ में टिप्पणी करते समय हम इसे बिना किसी किस्म की आत्मसजगता के अंतिम और संपूर्ण मान लेते हैं और इस आधार पर फैसला सुना देते हैं कि कहानी के बाहर जितने बच्चे हमने देख रखे हैं हामिद का औसत व्यवहार उनसे मेल खाता है या नहीं। हम इस बात की छूट देना भी याद नहीं रखते कि विपन्नता की जिस हद पर रहते हुए और दादी के प्यार की खूराक से पोषित होते हुए हामिद जीना सीख रहा है वह हमारे मध्यवर्गीय अनुभव की सीमाओं के बाहर अतः अपरिचित सा ज्ञात होते हुए भी हामिद के संदर्भ के लिये स्वाभाविक हो सकता है। वह उस संसार का वासी है जिसके बच्चे अपना बचपना जल्दी खो देते हैं। चार पांच साल की उम्र के इस बेहद गरीब बच्चे के चारो ओर एक बड़ा सा मेला है। बच्चे की जेब में कुल तीन पैसे है जिन्हे लेकर वह खरीदार की हैसियत से इस मेले में मौजूद है। इस मेले में वह अकेला नहीं है। उम्र में उससे थोड़ा ही बड़े हैसियत में उससे कुछ ही बेहतर उसके दोस्त भी साथ में मौजूद हैं। सामान्यतः उन्हें भी उसी विपन्न समाज और उसी वंचित बचपन के साकार अभिप्रायों के रूप में देखा जा सकता है लेकिन हामिद का आचरण अन्यों की तुलना में भिन्न और विशिष्ट होकर उभरता है। ये बाकी बच्चे हामिद के इसी आचरण की भिन्नता को एक परिप्रेक्ष्य देने और रेखांकित करने का कथात्मक उद्देश्य निभाने के साथ साथ यह भी रेखांकित करते हैं कि गरीबी की अंतिम रेखाओं के आसपास जीते हुए भी भूखे पेट सो रहने की विवशता ,आधापेट खा पाना, भरपेट खाने को पा जाना ,कभी कभी मनपसंद भी खा सकने की विलासिता की औकात रखना आदि देखने में भले ही उसी एक स्थिति की निकट श्रेणियां प्रतीत होती हों वस्तुतः वे एक दूसरे से गुणात्मक रूप से भिन्न जीवनस्थितियां हैं। हामिद पहली कोटि की विपन्नता के संसार का वासी है। मातापिताविहीन होने के कारण भावात्मक रूप से भी असुरक्षित हैं। उसके पास एक अकेली दादी है जो अपनी है। इन सारे संदर्भों को देखते हुए यह निष्कर्ष अनुचित नहीं कि कम से कम स्वयं प्रेमचंद ने तो पूरी यात्रा हामिद के बोध और तर्क की सीमाओं के साथ तय की है। *----------------------------------------------------------------------------------------------------------------आगे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए