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*** एक बीज की तरह : नरेश सक्सेना

कविता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. हमारे अपने समय का ऐसा दस्तावेज़, जिसके माध्यम से कवि प्रतीकों में इतिहास दर्ज करता है. इतिहास को तो तथ्यात्मक होना चाहिए, लेकिन कविता के पास यह स्पेस है कि वह अधिक विवरणात्मक और काल्पनिक होकर भी प्रतीकों में अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्त कर सके. आज की कविता में किस्से कहने का चलन तेज़ी से बढ़ा है. इन किस्सों में विवरण है और विवरणों में व्यक्त होती विडम्बना. विडम्बना आधुनिक कविता को उसकी आतंरिक लय देती है जो गेयात्मक हो यह ज़रूरी नहीं. यह लय आधुनिक कविता का अपना शास्त्र (शब्दावली) है, जिसे उसने आधुनिकता की यात्रा में अर्जित किया है. यहाँ शास्त्र परंपरागत रूप में कविता को बांधता नहीं है बल्कि उसे मुक्त करने का विन्यास है. यही लय कविता की स्वाभाविक गति भी है. चूँकि आज के समय में व्यक्ति की चुनौतियाँ, उसके संघर्ष, और सरोकार तेज़ी से बदले हैं. इसलिए कविता भी अपने पुराने फार्मूले से अलग हुई है. निरंतर परिवर्तित होते हुए विकास के अलग-अलग सोपानों को आधुनिक कविता की बुनावट और विश्लेषण के नए सन्दर्भों के रूप में कवि ने स्वयं प्रस्तावित किया है. यह प्रस्तावना नई और अग्रगामी है. इस प्रस्तावना के भीतर नरेश सक्सेना ने अपनी कविताओं की उपस्थिति बहुत मजबूती के साथ दर्ज करवाई है.
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