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*** हिन्दी नवजागरण और शिक्षा-चिंतन

नवजागरण कालीन साहित्यकारों,पत्रकारों और चिंतकों ने यूरोप से भारतीय संसर्ग में जिन सरोकारों पर विस्तार से विचार किया उसमें शिक्षा को पर्याप्त महत्व दिया है | यह स्वाभाविक भी था क्योंकि तुलनात्मकता की दृष्टि ने उस समय के चिंतकों का ध्यान आकृष्ट किया था जिससे शिक्षा के प्रति उनके नज़रिए का विकास हुआ | यह तब और भी रुचिकर हो जाता है जब यह बात सामने आती है कि नवजागरण के अग्रदूत यूरोपीय शिक्षा से साक्षात्कार के बावजूद उसके अंधभक्त मात्र बनकर नहीं रह गए बल्कि एक अच्छे शोधार्थी की तरह उन्होंने अपनी वैचारिक सम्पदा का विस्तार किया | ये विचार न केवल अपने समय की आलोचना को हमारे सामने रखते हैं बल्कि उनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता आज के शैक्षिक मूल्यांकन में भी अपनी गहरी भूमिका निभाती है | जाने माने शिक्षाविद प्रो.कृष्ण कुमार अपनी पुस्तक “गुलामी की शिक्षा और राष्ट्रवाद” में औपनिवेशिक कालीन शिक्षा और समकालीन शिक्षा पर विचार करते हुए आमुख में स्पष्ट लिखते हैं : “ हमारे स्कूलों और कॉलेजों में आज जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उसे ‘वैध स्कूली ज्ञान’ का दर्जा एक बहुत ही ख़ास किस्म के सांस्कृतिक और आर्थिक तनाव के दौरान हासिल हुआ है, और वह था औपनिवेशिक शासन का तनाव | बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों को प्रस्थान बिंदु बनाकर उस तनाव की सघनता का आँकलन करना आसान नहीं है जिसे भारतीय समाज ने समूची उन्नीसवीं सदी में खुद पर दर्ज किया था | न ही इस बात को मान्यता देना आसान है कि हमारे शैक्षिक संस्थान युवाओं को जो शिक्षा देते हैं , और उन्नीसवीं सदी में वैध विद्यालयी ज्ञान के रूप में जिन चीजों का चयन किया गया था ,उनके बीच कोई सीधी कड़ी जुड़ती है | यह तो तय है कि हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता हमें भरमा कर इस सोच तक ले आती है कि भारत में स्कूली ज्ञान की मौजूदा अवधारणा पर उस तनाव के कोई चिह्न मौजूद नहीं हैं जिसे औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समाज और और संस्कृति पर आरोपित कर रखा था|”1 *----------------------------------------------------------------------------------------------------------------आगे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए