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*** कबीर के बहाने आधुनिकता पर एक बहस

कबीर अपने समय में आधुनिक थे? यह कहने का फैशन-सा चल पड़ा है। इस कथन के पीछे जो विचार काम कर रहा है वह यह कि आधुनिकता कोई बहुत ही उम्दा और मानवीय मूल्य है जिसके बिना कोई भी मानवता का पक्षधर हो ही नहीं सकता। कबीर आधुनिक थे तो बु़द्ध और महावीर भी आधुनिक थे? इसमें कोई शक या गुंजाइश नहीं रहती है। इसके बरक्स कोई यह कहे कि इन्हें आधुनिक कहकर आप इनका अपमान कर रहे हैं तो वह प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया जायेगा। क्या हम कभी यह सवाल पूछते हैं कि कबीर, महावीर या बुद्ध इस बर्बर और अवमानवीकृत आधुनिकता का ठप्पा अपने ऊपर लगवाना भी चाहते हैं या नहीं? कबीर जैसा साधारण और सहज व्यक्ति आधुनिक बर्बरता और जटिल पूंजीवाद के दुष्चक्र में पिसते उपभोक्ता को देखकर भी यही कहता की ‘चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोए। दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए’। दूसरा सवाल यह है कि क्या हम आधुनिक हैं? और क्या जैसे हम आधुनिक हैं? वैसे आधुनिक कबीर हो सकते थे? क्या उन्हें वैसा आधुनिक होना चाहिए था? आधुनिकता चाहे औपनिवेशक हो या देशज वह आधुनिकता ही रहेगी। क्या हम में देशज आधुनिकता का कोई लक्षण है? जिस आधुनिकता के अन्तर्विरोधों के कारण दो महायुद्धों की त्रासदी मानवता को झेलनी पड़ी हो, परमाणु बमों से हुई अनन्त पीड़ा को भोगना पड़ा हो? हजारों छोटे-मोटे युद्धों में करोड़ों इंसानों का रक्त बहा दिया गया हो, मानवता के अपमान और हृास की कहानी पूरी सदी में बिखरी पड़ी हो, मानवीय गौरव और गरिमा के अवमानना का महाकाव्य जिस विचारधारा ने लिखा हो? उस विचारधारा का ठप्पा कबीर जैसे मानवीय गायक पर लगाने का प्रयास उनका घोर अपमान ही माना जायेगा।

पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने अपनी ‘कबीर’ नामक पुस्तक में कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहकर वास्तव में उन्हें आधुनिकता की पहली पंक्ति में ही पधरादेने की जो परंपरा प्रारंभ की थी उसका ही विस्तार डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपनी पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’ में किया है। देशज आधुनिकता का प्रारंभ कबीर से करने के प्रयास में वे यह सोच ही नहीं सके की इसी आधुनिकता ने हिटलर जैसा डिक्टेटर पैदा किया था। और अन्ततः हजारी प्रसाद द्विवेदी और पुरुषोत्तम अग्रवाल अलग-अलग तरह से उन्हें हिटलर की श्रेणी में ही बिठा रहे हैं।
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