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*** युद्ध के दिनों में प्रेम : उसने कहा था

गुलेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं और तीनो हीं प्रथम प्रेम की कहानियां हैं। सुखमय जीवन और बुद्धू का कांटा की मनोभूमि चञ्चल और उत्फुल्ल है जबकि उसने कहा था एक त्रासदी। इनमें तीसरी उसने कहा था असंदिग्ध रूप से भाषा और विषयवस्तु के साथ व्यवहार, संरचना और गठन आदि को देखते हुए हिंदी की पहली प्रौढ़ और प्राञ्जल कहानी है। इसकी कथा के गठन के विस्मयजनक चमत्कार, बहुपरतीय अर्थवत्ता, और भाव गहनता पर इतना कुछ कहा जा चुका है कि शायद अब अलग से कोई टिप्पणी भी फ़ालतू जान पड़े। लेकिन फिर भी, हर बार पढ़ने के बाद इसकी ताजग़ी पुनर्जीवित हो उठती है और कुछ कहने को शेष रह गया सा प्रतीत होता है। उसने कहा था के बहाने यह भी एक उत्तेजक और रोचक परीक्षा संभव है कि पाठकों की अलग अलग पीढ़ियां और अलग अलग दृष्टियां व रुचियां एक ही रचना के लिये अलग अलग प्रतिक्रियाएं कैसे करती हैं, न केवल पीढ़ीगत बल्कि व्यक्तिगत भी। 
नयी कहानी के दौर में उसने कहा था में चित्रित प्रेम के सत्य और विश्वसनीयता को लेकर एक रोचक बहस चली थी। उस बहस में उठाये गये प्रश्नों के सिरे से देखा जाय तो पूरी कहानी को एक भावुक अतिरंजना में पगा हुआ पाया गया था जिसे कथानक के संरचना–कौशल ने धारासार अश्रुप्रवाह में बह जाने से बचा लिया है। बहस साप्ताहिक हिन्दुस्तान मेँ छपी थी।

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