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*** फ़िल्मी गीतों की समकालीन प्रवृत्तियों पर एक दृष्टि

पिछले वर्ष फ़िल्मी गीतों की दुनिया में एक अभूतपूर्व विवाद जुड़ा जब ‘डी.के. बोस’ नाम के एक सज्जन को एक टीवी चैनल पर उनकी प्रतिक्रिया के लिए बैठा पाया | वे उस समय के एक प्रसिद्ध फिल्मी गीत ‘भाग-भाग डी के बोस’ से इतने प्रताड़ित हो चुके थे कि सीधे खबर का हिस्सा ही बना दिए गए | पत्रकार उनकी भावनाओं को अपने दर्शकों के सामने लाने के लिए बहुत प्रयत्नशील दिख रहे थे और वे अपनी बारी आने पर केवल अपने दुःख को व्यक्त कर देते थे या फिर बहुत धैर्य के साथ विशेषज्ञों की टिप्पणियों को सुनने समझने का प्रयास करते हुए शायद यह समझ पा रहे थे कि उस पूरे कार्यक्रम में वे खुद एक उत्पाद में परिवर्तित होते चले जा रहे थे | इस गीत के लेखक हैं अमिताभ भट्टाचार्य और इसे हमारे सेंसर बोर्ड की स्वीकृति भी प्राप्त थी लेकिन इसकी सामाजिक जवाबदेही के नाम पर सबसे बड़ा तर्क यही था कि इसे अपार लोकप्रियता मिली है और इसका आधार भी दिल्ली का वही युवा समाज है जो मुहावरीय आँधी आने पर एक विशेष गाली का उपयोग करता है और उसे हास्य के एक चलताऊ साधन के रूप में अपनाता है | इस तरह यह गीत जनता से ही पैदा हुआ और जनता में ही व्याप्त हुआ लेकिन इसे फिल्मी रूप देने वाले मास मीडिया ने डी.के. बोस नाम के लोगों को जैसे ‘जनता’ मानने से इनकार किया और फिर विवाद का एक दौर थम गया | यही नहीं, डी.के. बोस के साथ ‘शीला की जवानी’ और ‘मुन्नी बदनाम हुयी डार्लिंग तेरे लिए’ की मुन्नी और शीला की फिल्मी अमरता ने कुछ जीवित शीलाओं और मुन्नियों को भी इसी तरह प्रताड़ित किया और वे भी अखबारी मजा लेने के माध्यम भर की पहचान लिए सिमट गयीं | शीला वाले गीत का राजनीतिक उपयोग भी हुआ हो या निकट भविष्य में होगा इसके भी प्रबल आसार हैं | इसके बाद तो अभी तक ये सिलसिला जारी है जो कि ‘बबली’ को बदमाश बताता है और फिल्म के बाहर के पाण्डेय जी लोगों के चरित्र को इस नायकत्व के साथ प्रस्तुत कर रहा है कि वे ऑन ड्यूटी सीटी बजाने के लिए तो प्रसिद्ध हैं ही, लेकिन उनकी ख़ास बात यह है कि ‘फँसते नहीं हैं कोई काण्ड करके !’ *----------------------------------------------------------------------------------------------------------------आगे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए