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*** ‘क़िस्सा कोताह’ : एक कवि की बहक

क़िस्सा क्या है? कहानी का कच्चा माल’, कहानियों के इस कच्चे माल को बरतने में राजेश जोशी ने कोई कोताही नहीं बरती और अपने पाठकों के लिए विधागत सीखचों के बंधन से मुक्त एक ‘मुक्त-सा गल्प’ रच डाला. यह उन्मुक्तता ‘किस्सा कोताह’ में छाई हुई है. मुक्त-सा इसलिए भी कि ‘किस्सों को कहानी बनने में वक्त लगता है, एक पूरी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है’ लेकिन इससे पहले ही किस्सा हाथ छुड़ाकर कभी उपन्यास कभी शहर गाथा कभी आत्मकथात्मक संस्मरण तो कभी कोरी ‘गपड़तान’ हो जाते हैं.
इस अर्थ में ‘किस्सा कोताह’ हिन्दी की पहली और मजेदार ढंग से अकेली ऐसी रचना है जो पाठक की उस ‘एक अजीब-सी लत’ को तोड़ने का काम करती है जिसके चलते पाठक ‘किसी भी चीज को पढ़ने से पहले वह जान लेना चाहता है कि वह जिस किताब को पढ़ रहा है वह क्या है यानी पहले उसकी विधा तय होना चाहिए’. बंधी-बंधाई बनी-बनाई मानसिकता या दूसरे शब्दों में कहें तो दूराग्रहों, पूर्वाग्रहों पर चोट करती राजेश जोशी की ‘किस्सा कोताह’, नयेपन की माँग करती है. भले ही आज के राजनीतिक आर्थिक समीकरणों के बीच यह एक गप्पी की गपड़तान ही क्यों ना लगे. ज़रूरी है इन क़िस्सों का ज़िंदा रहना, बनते रहना, सुनते रहना और सुनाया जाना, जिससे उदासीनता के वातावरण को भंग किया जा सके.
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