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*** भारतेन्दुयुगीन आलोचना

आलोचना कीशुरूआत भारतेन्दु से मानी जाती है तो बालकृष्ण भट्ट से और ‘प्रेमघन’ से भी.‘‘साधारणतः हिन्दी-विद्वानों की यह धारणा बनी हुई है कि प्रेमघनजी ही हिन्दी के सर्वप्रथम समालोचक हैं.’’1 इसके अलावा वैचारिक घालमेल भी है. जिसमें एक तरफ तो यह कहा जाता है कि, ‘‘भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र आधुनिक युग के सर्वप्रथम आलोचक हैं.’’ दूसरी तरफ सोच समझ से मुक्त यह भी कहा जाता है कि ‘‘आधुनिक हिन्दी आलोचना का सूत्रपात भारतेन्दुयुग में उपाध्याय पं. बदरीनारायण चैधरी ‘प्रेमघन’ ने किया.’’2 भारतेन्दुयुग में आलोचना की शुरूआत किसने की उससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है यह जानना कि आलोचना का आरंभिक और विकासात्मक स्वरूप क्या रहा.
आरंभिक काल में पत्र-पत्रिकाओं की सम्पादकीय टिप्पणियों, प्राप्ति स्वीकारों और यदाकदा सम्पादक के नाम पत्रों के ही रूप में आलोचना दिखाई पड़ती है. लेकिन धीरे-धीरे यह स्वरूप बदलता है. पुस्तक-परिचय वाली शैली ही समसामयिक पुस्तकों की विस्तृत आलोचनाओं के रूप में विकसित होती है.‘आनंद-कादम्बिनी’ की ‘संयोगिता-स्वयंवर’ और ‘बंग-विजेता’ तथा ‘हिन्दी प्रदीप’ की ‘सच्ची समालोचना’ इसी शैली के प्रौढ़ उदाहरण हैं. इसमें पुस्तक परिचय का हल्कापन नहीं है. इनमें सत् साहित्य को प्रोत्साहन और असत् के बहिष्कार की सदिच्छा ही प्रधान है, इसलिए ये समीक्षाएँ गंभीर और विश्लेषणात्मक है.3


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