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*** ख़बर और लोकप्रियतावाद

आज यदि हम अपने समय के उपलब्ध मीडिया उत्पादों पर नज़र डालें तो पायेंगे कि वे अधिक से अधिक व्यावसायिक लाभ कमाने, अधिक से अधिक लोकप्रिय होने और अत्यधिक सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया में विकसित हुए हैं | बाज़ारवादी मीडिया व्यवस्था किसी भी कीमत पर इन तीन उद्देश्यों को प्राप्त करना चाहती है और इस क्रम में वह वास्तव में नागरिकता की समझ और उसके व्यवहारों को हटाकर उसकी जगह स्वच्छंद स्वभाव के उपभोक्ता को बनाना चाहती है जो अपने पुराने मूल्यों और परम्पराओं से तो संघर्ष करे लेकिन साथ ही वह स्वयं भी एक उत्पाद में परिवर्तित होता चला जाए | उसके उत्पाद में बदलने से यह फ़ायदा होता है कि मीडिया कम्पनियाँ अपने पाठकों-दर्शकों-श्रोताओं को भी बेचती हैं और सारी दुनिया की मार्केट में अपनी साख पैदा करती हैं | इस लिए यह मीडिया व्यवस्था सतही तौर पर तो बेहद आधुनिक और लोकतांत्रिक वातावरण बनाने वाली इकाई दिखती है लेकिन बहुत ही सावधानी के साथ देखा जाए तो उन्होंने मनुष्य की मुक्ति के रास्तों को अब तक के इतिहास में सबसे कठिन बना दिया है | इस समूची व्यवस्था को टेक्नोलॉजी का भी ऐतिहासिक समर्थन प्राप्त है जिसके कारण इसकी संरचना को तोड़न लगभग असंभव है | उसके पास लोगों के समय और उनकी पसंद का बेजोड़ अध्ययन है जिसके बल पर वह उन्हें मनोरंजन के नशे में लगातार बेहोश करती है और कभी भी उनमें विचार करने की ऐसी क्षमता पैदा नहीं होने देती जिससे वे तटस्थ और स्वतंत्र होकर अपने असल मुद्दों की पहचान कर उसका सही विश्लेषण कर सकें | सच कहा जाए तो उसने बहुत ही खूबी से जनता के अड्डों (पब्लिक स्फेयर) का प्रबंधन सीख लिया है | वह लोगों और उनकी मनःस्थिति का व्यापार तो करती ही है साथ ही वह उनके मन को कई खण्डों में विभाजित कर हमेशा तनाव में रखना चाहती है जिससे कभी भी वह तसल्लीबख़्श होकर एकजुट एकाग्रता की स्थति को प्राप्त न होने पाए | यही कारण है कि लोकतांत्रिकता की आड़ में हमारे पास सूचनाओं का अम्बार तो लग जाता है लेकिन सम्प्रेषण के मामले में हम लगातार गरीब होता जा रहें हैं |

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