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*** आचार्य द्विवेदी पर अन्यतम पुस्तक

हक़ अदा हुआ पंडित जी पर कई किताबें हैं। एक तो शिव प्रसाद सिंह ने संपादित की है ‘शांतिनिकेतन से शिवालिक तक’। लेकिन पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी का जो सम्पूर्ण जीवन चरित्र है, जिसमें उनका जीवन संघर्ष और रचनात्मक संघर्ष शामिल है, साथ ही उनके अंतर्जगत की पीड़ा, दर्द और बेचैनी है- उन तमाम चीजों को एकत्र कर किसी किताब में आज तक तो लिखा नहीं गया था।
मेरी जानकारी में उनके शिष्यों में सबसे निकट विश्वनाथ त्रिपाठी अंत तक रहे। पंडित जी 1950 में काशी आये। मैं तो वहां था ही। संयोग से एक या दो साल बाद, विश्वनाथ त्रिपाठी भी आ गये। और विश्वनाथ त्रिपाठी की जैसी स्थिति थी, काशी में वे पढ़ाई कर नहीं सकते थे, यदि पंडित जी न होते तो। इसलिए अंतरंग रूप में परिवार के बाहर के लोगों में सबसे निकट, 1950 से लेकर जीवनपर्यंत विश्वनाथ त्रिपाठी रहे। अंदर से बाहर तक जितना वे जानते हैं उतना कोई नहीं जानता। पंडित जी उनके सामने खुलते भी थे बातचीत भी करते थे। इसलिए वही अधिकारी विद्वान हैं और बहुत दिनों से उनके मन में आकांक्षा थी कि पंडित जी पर वे किताब लिखें।
देखकर खुशी हुई कि अपना संकल्प उन्होंने पूरा कर लिया और पुस्तक का नाम स्वयं पंडित जी की कविता में से उन्होंने लिया है ‘व्योमकेश दरवेश’। पंडित जी व्योमकेश अपने को कहते थे। विनोद में लिखा है कि उनके केश उड़ते रहते थे तो व्योम को छूने वाले उनके केश थे इसलिए वे व्योमकेश हुए, साथ ही में दरवेश, जैसे सूफी दरवेश होते हैं।
किताब का नाम बहुत अच्छा रखा है विश्वनाथ जी ने। पूरी पुस्तक आठ खंडों में है। छोटी-सी भूमिका है। उसके बाद पहला खंड ‘बचपन, बसरिकापुर और काशीः अथेयं विश्वभारती’ उसके बाद ‘काशी विश्वविद्यालयः देखी तुम्हारी काशी’। अगला खंड है ‘आकाशधर्मा का विस्थापन’। इसमें बतलाया गया है कि कैसे उनका विस्थापन हुआ
जब पंजाब गये थे, तब के हालात का चित्रण जिस खंड में है, उसका शीर्षक दिया है ‘गाढ़े का साथी पंजाब’। फिर उसके बाद काशी आ गये। तब शीर्षक दिया ‘फिर बेतलवा उसी डार पर’ । सातवें खंड में उनके महाप्रयाण का वर्णन जिसका शीर्षक है – ‘व्योमकेश दरवेश चलो’। अंतिम खंड हैः- ‘रचना और रचनाकार’, जो छह अध्यायों में बंटा है। पहले अध्याय में उन्होंने पंडित जी की कविताओं के बारे में भी लिखा है। लोग उनके कवि रूप को बहुत कम जानते हैं। मैंने कहकर राजकमल से संग्रह छपवाया था- ‘रजनी-दिन नित्य चला ही किया’। सबसे रोचक हैः ‘मैं स्वयं निज प्रतिवाद’। पंडित जी कहते थे कि वे स्वयं अपना प्रतिवाद हैं। ये डायलेक्टिक्स जो है, उनमें बहुत था। अंतिम दो अध्यायों का ठीक ही शीर्षक दिया हैः ‘इतिहास और आधुनिकता’ और ‘भारतीय सामूहिक चित्त का निर्णय’।
अंतिम दिनों में काशी में उनका इलाज नहीं हो सकता था। मालूम हो गया कि वह लगभग असाध्य बीमारी कैंसर हैं तब उन्हें वहां से दिल्ली लाया गया। दिल्ली आयुर्विज्ञान संस्थान में उनको भर्ती कराया गया। दिल्ली के प्रसंगों और अंतिम शवयात्रा का बड़ा मार्मिक वर्णन विश्वनाथ जी ने किया है। उनके सारे जीवन को, पूरे इतिहास को साक्षात् दर्शक के रूप में देखा था विश्वनाथ जी ने। इसलिए यह अत्यंत विश्वसनीय और प्रामाणिक जीवन-चरित्र है। और एक सबसे खास बात यह है कि यह पंडित जी की तो जीवनी है ही, स्वयं विश्वनाथ त्रिपाठी की भी आत्मकथा है। जब वे काशी आये तो काशी के वातावरण में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कौन-कौन लोग थे, क्या करते थे, उन सब की जीवंत कहानी उपन्यास की तरह लिखा है विश्वनाथ जी ने। जैसा कि ‘नंगातलई का गांव’ में उन्होंने अपने बचपन के बारे में लिखा है। तो इसलिए यह सामान्य जीवनियों से अलग है। इस पुस्तक को भी पढ़ने में उपन्यास का-सा कथा-रस मिलता है। और भाषा तो विश्वनाथ जी की अपनी है ही। बानगी देखियेः- ‘परंपरा की पहचान कालक्रम से नहीं, इतिहासबोध से होती है। इतिहासकार मानते हैं कि विगत् शताब्दियों की ऐतिहासिक पहचान हम अब ज्यादा अच्छी तरह इसलिए कर सकते हैं, क्योंकि हम उनसे दूर हैं। दूरी पहचान बढ़ाती है, इस उलटबांसी का कारण है कि इस फासले में हमें उस शताब्दी की पहचान करने के लिए कुछ नये उपकरण और नयी सामग्री, सूचना मिल गयी है। अब हम उस विशिष्ट काल-खंड को व्यापकतर परिप्रेक्ष्य में देख सकते हैं और दूसरी प्रवृतियों को निर्माण करने वाले अनके नये घटकों को जानते हैं’।
पंडित जी के मन की जो वेदना है, वह जगह-जगह छलकती है। ऊपर से बहुत ठहाके लगाते थे वे, लेकिन उन ठहाकों के पीछे उनकी जो अपनी वेदना थी उस वेदना को, जो कहीं खुल नहीं पाती थी, उसे खोला गया है। विश्वनाथ जी कभी-कभी मुझसे कहा करते थे कि गुरू जी ज्ञान की गठरी तो आप ही के सामने खोली थी, तो मैं ठीक ही कहता था कि ज्ञान की भले ही मेरे सामने खोली हो, लेकिन जीवन की गठरी तो आपके सामने ही खोली है। कहा तो यह गया है- ‘हक़ तो ये है कि हक़ अदा न हुआ’। लेकिन विश्वनाथ जी ने तो यह पुस्तक लिखकर हक़ अदा कर दिया।


(दूरदर्शन से साभार)



(पुस्तक समीक्षा ) ----------------------------------------------------------------------

सबद मिलावा होइ रहा देह मिलावा नाहि
कवल कुआं में प्रेम रसु पीवै बारम्बार
विश्वनाथ त्रिपाठी की यह किताब ‘व्योमकेश दरवेश’ कदाचित उक्त पद की तरह पढ़ी जा सकती है। पूरी लगती हुई यह किताब एक अर्थ में अधूरेपन का बोध भी कराती है। अनेक कथाओं-उपकथाओं और प्रसंगों से ‘आकाशधर्मा’ गुरु को उनकी वाजिब जगह पर सुस्थापित करती यह ऐतिहासकि कृति सिर्फ ‘पुण्य स्मरण’ में रिडयूस न होकर जादुई ढ़ंग से एक अमर आख्यान में तब्दील हो जाती है। सुविधा के लिए आप इसे जीवनी, संस्मरणात्मक जीवनी या संस्मरण कह सकते हैं किंतु बने-बनाए फार्म को तोड़ता यह महाआख्यान एक नए फार्म को आविष्कृत और स्थापित करता है और यह अवदान त्रिपाठी जी को उनके आलोचक रूप से अलग और कहना न होगा उपर ले जाता है।
इस किताब का एक पाठ आचार्य द्विवेदी के लिए है और वे इस किताब के माध्यम से हिन्दी साहित्य में उस स्थान को व्यक्ति, गुरु और लेखक के रूप में पाते हैं जो अब तक उन्हें अप्राप्त रहा। दूसरा पाठ स्वयं त्रिपाठी जी के व्यक्ति, शिष्य ओर लेखक का उभरता है जिसके बारे में स्वतंत्र रूप से लिखा जा सकता है और तटस्थ होकर ही लिखना संभव है । दोनों पाठ गुरु ओर शिष्य को अछूता ओर अदेखा शिखर देते हैं, किन्तु शिष्य के पाठ को यहीं छोड़ना उचत और गुरु की तरफ देखना प्रीतिकर और श्रेयस्कर होगा। त्रिपाठी जी आचार्य द्विवेदी को तमाम अंधेरों से निकाल कर उनके भीतर के उस ‘सहज सौंदर्य’ को भासमान करते हैं जो अलक्षित रहा है। और जैसा कहा गया है कि किताब में कि काशी प्रसंग (तत्कालीन साहित्य/लेखक मंडली) अनायास आ गया है किंतु ऐसा लगता नहीं, क्योंकि यदि वह किसी और रूप में आता तो द्विवेदी के व्यक्तित्व को जो नूर मिला, वह कदाचित धुंधला रह जाता। सो त्रिपाठी जी हर प्रसंग और अध्याय में बेहद सचेत भी हैं। यह और बात है कि उनकी शैली में सब कुछ नैसर्गिक गति में प्रवाहमान दीखता है। यह कहना अधिक प्रासंगिक होगा कि पंडित जी को ‘आकाशधर्मा’ के साथ ‘मिथक पुरुष’ बनाने में भी यह संस्मरणात्मक जीवनी अपनी भूमिका बखूबी अदा करती है।
पंडित जी और उनके व्यक्तित्व को समझने की कुजी उनका गांव है या कहें उनका गांव-जवार। डॉ. त्रिपाठी जी इसी कुंजी से व्यक्तित्व स्थापन की दिशा में सधे पांव आगे बढ़ते हैं। यही कारण है कि परिवेश की माटी, संस्कार, मिथ, किंवदंतियां, लोकाचार, लोकगंध, बानी-बोली की दीप्ति और आचार-विचार आदि से बनी पंडित जी के उदात्त व्यक्तित्व की गरिमा सहज रूप से प्रकट होती है। मुझे नहीं लगता हजारी प्रसाद जी के किसी समकालीन शिष्य की ऐसी प्रणति नसीब हुई हो। प्रणति का यह स्वर गांव से होता हुआ काशी, शांति निकेतन, पंजाब और दिल्ली तक क्रमशः आयात होता है। त्रिपाठी जी ‘रचना और रचनाकार’ अध्याय में अपने भीतर बैठे आलोचक को भी गुपचुप प्रतिभागी बनाकर पंडित जी के लिखे को नई अर्थाभास से भर देते हैं। वैसे एक पल को यह अध्याय अतिरिक्त लगा है और बेमेल किंतु वे अपनी आलोचना को हजारी प्रसाद जी की तरह निबंध शैली में भूल आख्यान का आविभाज्य अंग बना देते हैं। बिना इस अध्याय के समग्र व्यक्तित्व की निर्मिति मुमकिन न थी और इसीलिए ऊहापोह के बावजूद इसे लिखना पड़ा, ऐसा प्रतीत होता है। डॉ. त्रिपाठी के इस लेखन में आई भीतरी-बाहरी मुश्किलों, संकोच और विनम्रता के कठिन पलों को देखते हुए गालिब की एक रुबाई याद आती है-
मुश्किल है ज़ बस कलाम मेरा ए दिल
सुन-सुन के उसे सुख़नवराने-कामिल
आसान कहने की करते हैं फ़रमाइश
गोयम मुश्किल वगरना गोयम मुश्किल
कह सकते हैं कि यह शरीके-गालिब होने का आत्मीय सुख और मुश्किल दोनों है।
डॉ. त्रिपाठी द्विवेदी जी के व्यक्तित्व स्थापत्य में शांति निकेतन की भूमिका को जिस तरह प्रकाशित करते हैं, उससे पंडितजी शांति निकेतन की सृष्टि ही लगते हैं। यह अध्याय भी पूरे मनोयोग और परिश्रम से लिखा गया है। परिश्रम एक से अधिक बार। वहां रवीन्द्रनाथ, नंदलाल बोस, क्षितिमोहन सेन, नित्यानंद विनोद गोस्वामी, दीनबंधु एंड्रयूज, विधुशेखर भट्टाचार्य, रामकिंकर, मौलाना आदामुद्दीन आदि थे। विश्व मानव का प्रभाव उनके व्यक्तित्व से बनी आकाशधर्मिता को सिद्ध किया जा सकता है। इस अध्याय से ही पंडित जी को वह कीर्ति मिलती है, जिसके वे अधिकारी थे। आचार्य शुक्ल के समकक्ष होना क्या इसके बिना संभव हो पाता। शायद नहीं। गुरुऋण चुकाने की दृष्टि से यह अध्याय स्वर्णिम कहा जाएगा। गुरुदेव के काव्यतीर्थ को द्विवेदी जी जिस तरह हिंदी का तीर्थ भी बनाते हैं वह एक ऐतिहासिक प्रसंग है। अपना सर्वश्रेष्ठ वे शांति निकेतन में लिखते हैं जिसका विश्लेषण त्रिपाठी जी के साहित्य का एक सर्वथा नया आलोचना पाठ बन जाता है। वे द्विवेदी जी को मूलतः निबंधकार के रूप में देखते हैं। इनका यही रूप तमाम विधाओं में आद्यंत उपस्थित है और पाठकों को पाठ के लिए नई दृष्टि, नया मार्ग देता है।
इस अध्याय में हिन्दी के शिखर लेखकों के शांति निकेतन में आगमन और प्रवास के सुदर वृतांत हैं। इंदिरा गांधी, महाश्वेता देवी, शिवानी आदि के मार्मिक प्रसंग और उल्लेख। और पंडित जी की मानवीयता, प्रेम अनुराग और करुणा की मार्मिक कथाएं। उनकी पारिवारिकता को समझने के दुर्लभ सूत्र भी इसी अध्याय में मिलते हैं और उनका आचार्य रूप भी यहीं पर गुणात्मक रूप से खिला हुआ मिलता है। शांति निकेतन में काशी की तरह साहित्य की राजनीति और अशांति नहीं। इसके उलट मान-सम्मान अधिक और एक ऐसा सुकृन जो लेखन के लिए अनिवार्य है। इसीलिए उनका मन जितना शांति निकेतन में बना रह, उतना उनके अपने गृहप्रदेश में नहीं। हजारी प्रसाद जी के विस्थापन की कथा में इसीलिए शांति निकेतन की स्मृतियां बार-बार कौंधती हैं।
डॉ. त्रिपाठी के द्विवेदी जी के बचपन से निधन तक लेखन यात्रा में बसरिकापुर, काशी, शांति निकेतन, पंजाब और दिल्ली तक के प्रसंगों में कुछ बातों का बार-बार उल्लेख किया है जिसमें पंडितजी की निर्धनता, निर्धनता में उदात्तता, उदात्तता में सर्वस्पर्शिता और समावेशिता तथा परंपरा और आधुनिकता में सन्निहित संगति का आभास होता है। पंडितजी के विपुल साहित्य मे जातीय संस्कृति के मूल्यों का नितांत नई दृष्टि से अन्वेषण और परिभाषा तथा हिन्दी की अप्रतिम परंपरा में उनको स्थापित करने का काम डॉ. त्रिपाठी ने जिस समर्पण से किया है, वह हजारी प्रसाद जी और उनके साहित्य को महाकाव्यत्मक आभा से भरता है। यह आभा सिर्फ भक्ति से नहीं असहमतियों के कारण भी हैं। जहां-जहां वे पंडितजी के व्यक्तित्व और शिक्षण कर्म में कमियां या दरारें दृष्टव्य हैं, उन्हें छुपाने की चेष्टा नहीं करते अपितु उन पर टिप्पणियां करने में संकोच नहीं करते। मितकथन में ही सही यह आलोचना भाव कृति को विश्वसनीयता देती है। यह देखना दिलचस्प है कि काशी की लेखक और अध्यापक मंडली की राजनीति, विरोध और षडयंत्रों पर डॉ. त्रिपाठी जिस तरह निर्भय हस्तक्षेप करते हैं, वह विश्वविद्यालयी राजनीति के कुत्सित चरित्र को उजागर करता है, जिसका वीभत्स रूप आज दृश्य में अधिक साफ रूप में देखा जा सकता है।
इस पुस्तक में डॉ. त्रिपाठी ने उन शिष्यों के बारे में लिखा है जो पंडितजी के आत्मीय-परम आत्मीय थे। द्विवेदी जी की शिक्षा, अनुराग वृति, प्रेम और आत्मीय के अनेक उदाहरण हैं जो इस आख्यान को गुरु-शिष्य परंपरा की दृष्टि से मानवीय आलोक प्रदान करती है। डॉ. नामवर सिंह, शिवानी, त्रिलोचन, केदारनाथ सिंह, जगत शंखधर, इंद्रनाथ मदान, रामदरश मिश्र आदि के संदर्भ में त्रिपाठी जी ने पंडितजी की निर्मल संबंधशीलता और स्नेह को जैसे एक ओर अभिव्यक्ति दी है वहीं दूसरी ओर शिष्यों के गुणों के साथ उनकी मेधा और संघर्ष के बारे में भी संकेत दिए हैं। इन संकेतों में शिष्यों के अतीत का उत्खनन और भविष्य की रूपरेखा भी दृष्टव्य है। कहना होगा कि यह आचार्य द्विवेदी पर अब तक लिखी किताबों में अन्यतम है, जिसे इसकी विलक्षण शैली, सजल भाषा और चारुतापूर्ण गद्य के लिए याद किया जायगा।
----------------- रचनाकार : लीलाधर मंडलोई से साभार