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*** महावीर प्रसाद द्विवेदी युग : राष्ट्रवाद का दूसरा चरण

मध्यकालीन ‘रीतिकाल’ स्थूल कायिकता और रसिक-मनोरंजन का काव्य था। ‘भारतेन्दु-युग’ रीतिकालीनता, मध्यकालीनता और समाजोन्मुखी आधुनिकता का संक्रांति युग था। इसमें तत्कालीन सामाजिक यथार्थ और आधुनिक आकांक्षाओं के बीज अवश्य अंकुरित हुए। ‘द्विवेदी-युग’ तक आते-आते आधुनिक चेतना और स्पष्टता तथा स्वीकृति के साथ सामने आयी, किन्तु इस युग के कवियों ने सामाजिक विकृतियों को प्राचीन आदर्शों के प्रकाश में सुधारने में ही निष्वृति समझी। अतः ‘पुनरूत्थान’ की प्रवृत्ति ही प्रधान रही। फिर भी “हिन्दी साहित्य प्रधानतः उस राष्ट्रीय स्वाधीन चेतना का सहचर बन गया था जो साम्राज्यवाद के साथ सामंतवाद का भी विरोध कर रहा था।“1
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दौर में भारत में दूरगामी परिवर्तन हो रहे थे। सामा्रज्यवाद की बाधाओं के बावजूद देशी-पूंजीवाद विकास कर रहा था। तिलक की गिरफ्तारी पर बम्बई में मजदूरों ने हड़ताल की। 1907 में सरस्वती में हड़ताल पर लेख छप चुका था। “स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है” तिलक का यह नारा भारतीय जनमानस में व्याप्त चुका था। इन परिस्थितियों का आकलन करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि “सरकार से कुछ मांगने के स्थान पर अब कवियों की वाणी देशवासियों को ही ‘स्वतंत्रता की देवी की बेदी पर बलिदान’ होने को प्रोत्साहित करने लगी। अब जो आन्दोलन चले वे सामान्य जनसमुदायों को भी साथ लेकर चले। इससे उनके भीतर अधिक आवेश और बल का संचार हुआ। सबसे बड़ी बात यह हुई कि आंदोलन संसार के अन्य भागों में चलने वाले आंदोलनों के मेल में लाए गये, जिससे क्षोभ की एक सार्वभौम धारा की शाखाओं-सी प्रतीत हुए।“2
आचार्य शुक्ल ने राष्ट्रीयता को अंतर्राष्ट्रीयता के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने की कोशिश की। छायावाद राजनीति में महात्मा गांधी और साहित्य में जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ आदि का समय है। निस्संदेह इनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व जितना राष्ट्रीय है उतना ही अंतर्राष्ट्रीय। छायावाद के साथ ही समाज की सर्वातिशायी सत्ता और सर्वशोषी आधिपत्य के विरूद्ध व्यक्ति की प्रतिष्ठा का प्रादुर्भाव हुआ।
भारतेन्दु-युग से लेकर छायावाद तक की विकास प्रक्रिया को देखें तो एक नई धारणा बनती दिखती है। जहां योरोपिय देशों के साहित्य में ‘स्वच्छदतावाद’ के बाद ‘यथार्थवादी’ साहित्य का प्रतिफलन होता है वहीं औपनिवेशिक देशों में ये दोनों प्रवृत्तियां लगभग साथ-साथ फलीभूत होती हैं। हिन्दी साहित्य की विकास-यात्रा पर ध्यान दें तो ‘भारतेन्दु-युग’ अपेक्षाकृत अधिक ‘यथार्थवादी’ है, जबकि ‘छायावाद’- जहां स्वाधीनता आंदोलन अपने उठान पर था - ‘स्वच्छन्दतावाद’ चरम पर पहुंच जाता है।
हिन्दी कविता के इतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ खड़ी-बोली के प्रतिष्ठित होने का युग है। एक तरफ खड़ी-बोली को ब्रजभाषा के समकक्ष काव्यभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया, दूसरी ओर विकसित चेतना के कारण कविता नई भूमि पर संचरण करने लगी। स्वाधीनता आंदोलन ने खड़ी-बोली को अंतर्प्रादेशिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया था। अतः साहित्य-वृजन एवं उसके व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए यह भाषागत परिवर्तन अनिवार्य हो चला था। खड़ी बोली में यह क्षमता - संभव हो चुकी थी कि वह एकता का आधार बने।
द्विवेदी-युग तक आते-आते हिन्दी कविता में समाज के नीचले तबके की आवाज उठने लगती है। इसका प्रमाण है 1914की ‘सरस्वती’ में छपी ‘हीरा डोम’ की कविता।

बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजां, ठाकुरे के लेखे नहिं लउरि चलाइबि। सहुआ के लेखे नहिं डांडी हम मारबजां, अहिरा के लेखे नहिं गइया चोराइबि। भंटउ के लेखे न कवित्त हम जोरबजां, पगड़ी न बान्हि के कचहरी में जाइबि। अपने पसीनवां के पइसा कमाइबाजां, घरभर मिलि जुलि बाँटि-चोटि खाइबि।3

काव्य-शिल्प की दृष्टि से कहा जा सकता है कि यह कविता नहीं है। परन्तु इसे अनुशासनप्रिय संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपनी प्रतिष्ठित पत्रिका में स्थान दिया था। स्वाधीनता की चेतना जो पहले ‘बावु’-वर्ग में जन्मी वह धीरे-धीरे फैल रही थी। गांधी का प्रभाव जन तक पहुंच रहा था। आचार्य प्रवर जो कि स्वयं उपेक्षित चरित्रों की ओर कवियों का ध्यान खींच रहे थे, एक दलित की पीड़ा और उसके स्वाभिमान को नजरअंदाज नहीं कर सके। जैसा कि इस कविता वस्तु है, स्पष्ट है कि उसे अपने कर्मों पर घृणा नहीं अपितु स्वाभिमान है। अपने ‘पसीने की कमाई’ खाना और कथित उच्च वर्ग की विलासिता, (जो कि शोषण पर आधारित है) में यह कवि फर्क कर रहा है। उसे अपने परिश्रम का घमंड है। ‘हीरा डोम’ की यह चेतना निश्चित रूप से जिस राष्ट्र की कल्पना करती है, यह वही राष्ट्र नहीं है। या कह सकते हैं कि उस समय के प्रचलित ‘राष्ट्रवाद’ से उसका विरोध तो था! हीरा डोम की यह कविता श्रम की प्रतिष्ठा करने वाली संभवतः यह पहली हिन्दी कविता है। इतना ही नहीं वह मध्यकालिन ‘ईश्वर’ की अवधारणा पर भी प्रहार करता हैः
खंभवा के फारि पहलाद के बचवल जां, ग्राह के मुंह से गजराज के बंचवले। धोती जुरजोधना कै भइया छोरत रहै, परगट होके तहां कपड़ा बढ़ वले। मरले खन्नवा के पलुखे भभिखना के, कानी अंगुरी पर धैके पथरा उठवाले। कहवां सुतल बाटे सुनत न बाटे अब, डोम जानि हमनी के छुए से डेरइले।4

यहां ‘ईश्वर’ की सामंती अवधारणा और उससे निर्देशित होने वाला समाज, दोनों को खंडित कर दिया गया है। कवि ने समाज और राष्ट्र की सामंती, (और प्रकरांतर से अभिजातवादी) अवधारणा में ‘सेंधमारी’ की है।
मध्यकालीन ‘दीनबन्धु’ ईश्वर एक झटके में ‘सवर्ण’ के रूप में दिखाई पड़ने लगता है। हीराडोम की इस कविता के छपने के लगभग चार साल बाद स्वच्छदतावादी कवि श्रीधर पाठक की एक कविता आई थी:
मनु जी तुमने यह क्या किया? किसी को पौन, किसी को पूरा, किसी को आधा दिया। सरस प्रीति के थाल में बोया विष अनीति का बिया लुब्ध पाप का, क्षुब्ध शाप का साया सर पर लिया मनू जी तुमने यह क्या किया? और अधिक क्या कहें बाप जी कहते दुखता हिया जटिल जाति का, अटल पात्र का जाल है किसका सिया?5

श्रीधर पाठक का यह क्षोभ वर्णव्यवस्था के अनाचार पर ही है। इसमें कवि ने मनु और उनके सामाजिक एजेंडे को प्रश्नांकित किया है। वे केवल आरोप ही नहीं लगाते बल्कि साक्ष्यों द्वारा साबित करते हैं कि ‘‘यह थे भारत के बाप - मनु महाराज - जिन्होंने जातिगत जटिलता द्वारा समाज को पंगु बना दिया।’’6 श्रीधर पाठक आधुनिक हिन्दी के पहले कवि हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं से सदियों चली आती सवर्णवादी (या अभिजातवादी) समाज - व्यवस्था एवं उसकी चिन्तन-प्रक्रिया पर चोट करते हैं -
जग है सच्चा, तनक ना कच्चा, समझो बच्चा इसका भेद। पीओ, खाओ सब सुख पाओ कभी न लाओ मन में खेद। जगत को झूठा-झूठा कह के करो नहीं उसका अपमान।7

मध्यकालीन सोच में डूबे लोगों को कवि ने वैज्ञानिक तरीके से सोचने की सलाह देता है। वह जगत के ‘मिथ्यात्व’ वाले सामन्ती विचार को नकारता है। आध्यात्मिक कल्पना में डूबे राष्ट्रीय मानसिकता को कवि मुक्ति के मार्ग में बाधा मानता है। परन्तु, हिन्दी कविता की यह जनतांत्रिक धारा सुषुप्त होती गई। द्विवेदी-युगीन प्रतिनिधि कवियों ने उपेक्षित नारी को तो केन्द्र में रखा लेकिन उनका दृष्टिकोण उदार अभिजातवादी ही बना रहा।
द्विवेदी-युग एवं छायावाद, वस्तुतः मध्यवर्गीय सवर्णवादी राष्ट्रीयता का युग है। भारतेन्दु-युग के बाद हिन्दी क्षेत्र में शिक्षा-साक्षरता का प्रसार हुआ था। शिक्षा तथा व्यवसाय के प्रचलन से मध्यवर्ग का स्वरूप निर्मित हो रहा था और अधिकांशतः यही लोग समाज-सुधार एवं आर्थिक-राजनीतिक स्वाधीनता के लिए प्रयत्नशील भी थे। द्विवेदी-युग का लेखक प्रायः इसी वर्ग से अपने को जोड़ता है। इसी से पनपता है और अधिकतर इसी वर्ग को संबोधित भी करता है। ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ पुस्तक में डा0 रामविलास शर्मा ने लिखा है कि ‘‘द्विवेदी जी के इस कोटि के लेखन का सीधा संबंध ‘भारत-भारती’ से वैसे ही है जैसे भारत की वर्तमान आर्थिक अवस्था का चित्रण करते हुए भुखमरी, जमींदारों के अत्याचार, महाजनों की सूदखोरी और किसानों की तबाही की बातें करते हैं तो लगता है कि हम प्रेमचन्द के कथा-संसार में घूम रहे हैं। द्विवेदी जी कथा-लेखक नहीं थे और मैथिलीशरण गुप्त की तुलना में कवि भी बहुत साधारण थे। किंतु वैचारिक स्तर पर वह इन दोनों से आगे हैं, इन दोनों के काव्य संसार और कथा-संसार की रूप-रेखाएं उनके गद्य में स्पष्ट दिखाई देती हैं। इस दृष्टि से उन्हें युग-निर्माता कहना पूर्णतः संगत है।’’8 स्पष्टतः द्विवेदी जी अपनी वैचारिकी से साहित्यकारों को स्वाधीनता-आंदोलन का सहकर्मी बनाने का प्रयास करते हैं। गद्य में तो प्रेमचन्द जैसे कथाकार साम्राज्यवाद और सामंतवाद दोनारें से लोहा लेते दिखाई देते हैं लेकिन कविगण अपनी अभिजातवादी घेरेबंदी में ही तलवार भाँजते नजर आते हैं। वे अपने वर्ग-चरित्र का अतिक्रमण नहीं कर पाते हैं। यह अकारण नहीं है कि द्विवेदी-युगीन कवि मिथकीय चरित्रों में शरण गहते हैं तो छायावादी प्रकृति में। फिर भी,आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपनी प्रतिभा से हिन्दी कविता को उस रास्ते पर लाने का प्रयास किया, जिस तरफ भारतेन्दु ने मोड़ा था। हिन्दी कविता अब देशवासियों की ओर मुखातिब होती है।
मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ आदि में वर्तमान समय के उथल-पुथल को देखा जा सकता है
भव को नव वैभव व्याप्त कराने आया, नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया, संदेश यहां मैं नहीं स्वर्ग का लाया इस भूतल को स्वर्ग बनाने आया। 9

महात्मा गांधी के त्याग, बलिदान आदि मूल्यों को इस युग की रचनाओं के केन्द्र में देखा जा सकता है। इस समय के काव्य-नायकों को(नायिकाएं भी) समाज-सेवक के रूप में देखा जा सकता है। ‘प्रिय प्रवास’की नायिका जनसेवा में आत्मोत्सर्ग करने वाली एक समाज-सेविका है। इस युग के काव्य में स्वाधीनता-संग्राम के औचित्य पर भी लिखा गया हैः
वह प्रलोभन हो किसी के हेतु, तो उचित है क्रांति का ही केतु दूर हो ममता, विषमता, मोह आज मेरा धर्म राज-द्रोह। 10

लोकतांत्रिक-मूल्यों की स्थापना को लेकर छटपटाहट यहां देखी जा सकती है। राज-व्यवस्था (यानी की राजशाही) में विषमता और मोह जैसे दुर्गुणों से मुक्ति असंभव ही दिखाई देती है। यही कारण है कि राजद्रोह को धर्म की तरह प्रतिष्ठा दी गई है। यही नहीं, बल्कि गांधी के असहयोग आंदोलन की स्पष्ट झलक मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं में देखी जा सकती हैः
जाओ, यदि जा सको रौंद हमको यहां, यों कह पथ में लेट गए बहुजन वहां 11

असहयोग आंदोलन की झलक के साथ-साथ यहां, जनता का राजाज्ञा उल्लंघन भी पढ़ा जा सकता है। इसी भावना का विकसित रूप प्रगतिवादी काव्य में देखा जाना चाहिए। द्विवेदी युगीन कवियों ने समाज के उपेक्षितों को काव्य का विषय बनाया है। इस समय सहानुभूति के प्रधान पात्र अछूत,किसान, मजदूर, स्त्री, भिक्षुक आदि हुए। लेकिन ध्यान रहे कि इनके प्रति इन कवियों को सहानुभूति ही थी, वह विक्षोभ नहीं था जो हीराडोम की कविता या श्रीधर पाठक की कविता में हमने देखा है।
खपाया किए जान मजदूर, पेट भरना पर उनका दूर। उड़ाते माल धनिक भरपूर, मलाई लड्डू मोती चूर।।12


इस युग में मैथिलीशरण गुप्त के ‘किसान’ (1915), गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ के ‘कृषक-क्रंदन’ (1916) और सियाराम शरण गुप्त के ‘अनाथ’(1917) में किसान और श्रमजीवी के प्रति जमींदार और पुलिस आदि के द्वारा किए गए घेर अत्याचारों का निरूपण हुआ है।
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि, भारतेन्दु युग के कवि भारतीय जन को कर्तव्य-पालन के लिए ललकार रहे थे। स्वदेशी अपनाने और आपसी प्रेम को बढावा देने का आग्रह करते नजर आते हैं। परन्तु, स्वाधीनता और स्वत्व-ग्रहण करने के लिए अधिकार भाव से आगे आने का आह्वान तो द्विवेदी युग में ही होता है। अब ये कवि अधिकार के लिए राजद्रोह करने पर उतारू हैं।
-------------------------------------------------------------------- 1. हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास, पृ0-79 2. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ0-438 3. वही, पृ0 111 4. श्रीधर ग्रंथावली, पृ0-445 5. कविता के सौ बरस, पृ0-49 6. श्रीधर ग्रंथावली, पृ0-127-130 7. रामविलास शर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण, पृ0-121 8. मैथिलीशरण गुप्त, साकेत, पृ0-11 9. वही, पंचम सर्ग 10. वही 11. वही 12. गया प्रसाद शुक्ल सनेही, मर्यादा, भाग-15, संख्या-2, पृ0-49
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डॉ. अनिल कुमार से साभार